हरिद्वार। शिक्षा दिवस के शुभ अवसर पर जारी एक विस्तृत वक्तव्य में जाति प्रथा को मानव समाज के लिए एक बड़ा अभिशाप करार दिया गया। वक्तव्य में कहा गया कि देश को आजाद हुए लगभग 80 वर्ष बीत जाने के बाद भी आधुनिक परिवेश में जातिवाद का जहर चरम पर है, जिसके कारण मानव ही मानव का दुश्मन बना हुआ है।
संतों और महापुरुषों का संदेश
लगभग 2500 ईस्वी पूर्व से ही कबीरदास, संत रैदास, महात्मा बुद्ध और गुरु नानक देव जी जैसे महापुरुषों ने अपनी विचारधारा के माध्यम से समाज को मानवता का पाठ पढ़ाया।
संत रैदास जी की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा गया:
“रैदास जन्म के कारणे होत न कोऊ नीच।
नर को नीच कर डारी दे, ओछे कर्म की कीच।”
अर्थात, जन्म के आधार पर कोई भी व्यक्ति ऊँचा या नीचा नहीं होता। शास्त्रों और धर्मग्रंथों—जैसे वेद, कुरान, पुराण, भगवद्गीता, रामायण और उपनिषद—में भी ‘कर्म ही पूजा है’ (Work is Worship) के सिद्धांत पर जोर दिया गया है। व्यक्ति अपने अच्छे संस्कारों और श्रेष्ठ कर्मों के बल पर ही निम्न पायदान से उठकर शीर्ष स्थान हासिल करता है।
संस्थानों में व्याप्त भेदभाव पर गहरी चिंता
वक्तव्य में इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया गया कि वर्तमान दौर में ब्यूरोक्रेसी, सरकारी विभागों, राजनीतिक क्षेत्रों, सामाजिक संस्थाओं और कॉरपोरेट जगत में उच्च पदों पर बैठे कुछ लोग निम्न पदों पर कार्यरत दलित व अनुसूचित जाति के अधिकारियों और कर्मचारियों का मानसिक एवं सामाजिक उत्पीड़न करते हैं।
इस प्रकार की रूढ़िवादी मानसिकता के कारण कई बार स्थितियां इतनी गंभीर हो जाती हैं कि पीड़ितों को आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ता है। दिल्ली के एक डीटीओ और जेएनयू (JNU) के छात्र रोहित वेमुला जैसे उदाहरण इसी जातीय शोषण के दुष्परिणाम हैं।
जातिवाद समाप्त करने और मानवता अपनाने की अपील
वक्तव्य में स्पष्ट किया गया कि नाम के आगे सरनेम या टाइटल लगाने से कोई व्यक्ति महान या विद्वान नहीं बन जाता, बल्कि व्यक्ति का कर्म ही उसे प्रतिभाशाली और पूजनीय बनाता है। प्राचीन समय में जिस वर्ण व्यवस्था का निर्माण हुआ था, उसके आधार पर आज के आधुनिक लोकतंत्र में किसी का वर्गीकरण या शोषण करना पूरी तरह से अमानवीय, अशोभनीय और अस्वीकार्य है।
पंक्तियों के माध्यम से मानवता का सार प्रस्तुत किया गया:
“मानवता ही मानव जीवन की है सच्ची पहचान,
यदि मानवता से शून्य है वह मानव पशु समान।”
उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक सोच के विस्तार के साथ-साथ समाज से जातिवाद का जहर धीरे-धीरे खत्म होना चाहिए। सभी नागरिकों से अपील की गई है कि वे महापुरुषों के विचारों से प्रेरणा लें, अच्छे कर्म करें और आपसी प्रेम, भाईचारे व करुणा के साथ एक-दूसरे का सम्मान करें।

More Stories
अवैध प्लॉटिंग पर एमडीडीए का शिकंजा, झाझरा में पांच बीघा अनधिकृत प्लॉटिंग ध्वस्त
टिहरी झील क्षेत्र को मिलेगा स्मार्ट पर्यटन का नया स्वरूप
जनगणना-2027 के द्वितीय चरण के प्रथम दिन का प्रशिक्षण सम्पन्न