परमार्थ निकेतन में धूमधाम से मनायी गयी महाशिवरात्रि*
परमार्थ गुरूकुल के आचार्यों व ऋषिकुमारों ने निकाली भगवान शिव जी की बारात*
भक्ति, वेदध्वनि और शिवत्व का दिव्य उत्सव*
आइए, इस महाशिवरात्रि अपने मन को कैलाश बनाएं, हृदय को गंगाजल सा निर्मल करें और जीवन को शिवमय बनाए*
स्वामी चिदानन्द सरस्वती*
ऋषिकेश, 15 फरवरी। परमार्थ निकेतन में महाशिवरात्रि का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक गरिमा के साथ मनाया गया। परमार्थ गुरूकुल के आचार्यों व ऋषिकुमारों ने भगवान शिव जी की बारात निकाली। सम्पूर्ण आश्रम परिसर “हर-हर महादेव” और ऊँ नमः शिवाय” के गगनभेदी जयघोषों से गुंजायमान हो उठा। स्वयं देवाधिदेव महादेव की यह दिव्य धरती और परमार्थ गंगा तट शिवमय हो गया।
परमार्थ निकेतन में आयोजित महाशिवरात्रि रिट्रीट में देश-विदेश से आये साधक, योगी, और श्रद्धालु शिवरात्रि के इस पावन अवसर पर शिवकृपा प्राप्त करने हेतु एकत्रित हुए। परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने वेदमंत्रों के उच्चारण, ताल-नगाड़ों की गूंज और शंखध्वनि के साथ भगवान शिव की भव्य बारात निकाली। यह दिव्य शोभायात्रा आश्रम परिसर से होकर गंगा तट तक पहुँची, जहाँ भक्तों ने पुष्पवर्षा कर शिवबारात का स्वागत किया।
ऋषिकुमारों की वेदपाठ की मधुर ध्वनि ने वातावरण को पवित्र कर दिया। उनके द्वारा गाये गये रुद्राष्टाध्यायी, महामृत्युंजय मंत्र और शिवस्तोत्रों ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को भाव-विभोर कर दिया। नगाड़ों की ताल और डमरू की गूंज के साथ भक्तगण नृत्य और कीर्तन में लीन हो गये।
संध्या समय विशेष शिवाभिषेक का आयोजन किया गया, जिसमें गंगाजल, दुग्ध, दही, मधु, बिल्वपत्र और पुष्पों से भगवान शिव का अभिषेक होगा। आज के दिन सामूहिक रूप से ऊँ नमः शिवाय” का जप करते हुए अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और अज्ञान को समर्पित करने का संकल्प लें।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने प्रेरणादायी संदेश में कहा कि महाशिवरात्रि, चेतना की रात्रि है जो हमें विनाश से सृजन, अंधकार से प्रकाश और सीमितता से अनंतता की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि शिव अर्थात् कल्याण। जब हम अपने भीतर के विकारों को त्यागते हैं, तब हमारा जीवन भी शिवमय हो जाता है। तप, त्याग, सेवा और ध्यान के माध्यम से हम अपने मन को शिवालय बना सकते हैं।
महाशिवरात्रि, आत्मजागरण की दिव्य रात्रि है, यह रात्रि हमें भीतर की सुप्त चेतना को जगाने का अवसर देती है। शिवरात्रि के दिन उपवास का भी अत्यधिक महत्व है। ‘उप’ अर्थात् समीप और ‘वास’ अर्थात् निवास अर्थात् भगवान के निकट रहना। अभिषेक, आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। जब हम शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, मधु और बिल्वपत्र अर्पित करते हैं, तब वस्तुतः हम अपने मन के विकारों को धो रहे होते हैं। जल से शांति, दूध से पवित्रता, मधु से मधुरता और बिल्वपत्र से समर्पण का भाव जागृत होता है। अभिषेक हमें संदेश देता है कि जीवन को निर्मल, सरल और करुणामय बनाना ही वास्तविक आराधना है।
रात्रि में जागरण एवं सत्संग का आयोजन हुआ। भजन, कीर्तन, ध्यान और साधना के साथ श्रद्धालु पूरी रात शिवनाम में लीन हुये। डमरू की ताल और घंटों की ध्वनि से पूरा वातावरण आध्यात्मिक हो उठा। परमार्थ गंगा तट पर सामूहिक ध्यान ने प्रत्येक साधक को आत्मिक शांति और ऊर्जा का अनुभव कराया।
आइए, इस महाशिवरात्रि अपने मन को कैलाश बनाएं, हृदय को गंगाजल सा निर्मल करें और जीवन को शिवमय बनाएं।

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