श्रीलंका हिन्द महासागर में एक आँसू की बूंद की तरह है। (डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ श्रीलंका)
जिसको पूर्व में सिलोन तथा 1972 के आजादी के बाद लंका से श्रीलंका कहा जाने लगा। यह चारों ओर से महासागर से घिरा है। उत्तर, पूर्व और पश्चिम में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर है।
पुर्तगाली, डच और ब्रिटिशर ने बारी-बारी से इस पर अपना आधिपत्य जमाया। यहाँ पर भारतीय उपमहाद्वीप के एशियाई और यूरोपीय संस्कृति का मिश्रण रहा है। किसी समय पोलोनरुवा का क्षेत्र पूरे एशिया में कृषि तकनीक के लिए प्रसिद्ध रहा। आज यह वर्ल्ड यूनेस्को हैरिटेज का संरक्षित क्षेत्र है। स्तूप, किला, पूर्व के मेडिकल कॉलेज इत्यादि लगभग 40-50 एकड में फैला परिसर है। पूर्व में अनुराधापुर किसी समय यहाँ की राजधानी रहा जो कि मध्य पूर्व में स्थित है।
अनुराधापुर का क्षेत्र ज्यादातर बौद्ध मान्यता वाले लोगों का रहा। यहाँ पर आकर अशोक-पुत्र राजा महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने भारत से लाकर बोधिवृक्ष का रोपण किया और धम्म के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दिया। यहाँ की गुफाओं में भित्ति चित्र बने हुए हैं, बुद्ध की बैठी और लेटी हुई प्रतिमाएं हैं। यहाँ पर चौथा संघायन और त्रिपिटक को पहली बार ताड़ पत्रों पर लिखा गया। प्रारम्भ में श्रमण संस्कृति का यहाँ के राजाओं ने खूब प्रचार-प्रसार किया। श्रीलंका भी बहुत से आंतरिक और बाह्य आक्रमणों से गुजरा। बीच में राजा के निर्वासन के समय 14-15 साल बौद्ध धर्म यहाँ से समाप्त हो गया। भिक्षुओं को मार दिया गया और मठों को जला दिया गया। बाद में म्यांमार और थाईलैंड से भिक्षुओं को बुलाकर मठों का पुनः जीर्णोद्धार किया गया। एक समय पर डचों ने आक्रमण किया, पुर्तगालियों ने आक्रमण किया और अंग्रेजों ने आक्रमण किया। इन्होंने शहर के किलों और शहर को भव्यता प्रदान की। किसी समय यहाँ से मध्य एशिया और चाइना को व्यापार हुआ करता था। द्वितीय-विश्व युद्ध में ही इस बन्दरगाह का निर्माण हुआ और एक भव्य किले तथा नगर के चारों से सुरक्षा के लिए एक दीवार बनायी गयी। बाद में ब्रिटिश आये तो उन्होंने भी पुनः इसके विकास में योगदान दिया। 1700 ई० से 1941 तक उन्होंने यहाँ राज किया। यहाँ के मूल निवासी कुछ आदिवासी रहे, बाद में कलिंगा और बंगाल से आये लोग इस प्रकार से सिंहली संस्कृति का विकास हुआ। उत्तर में भारत के दक्षिण राज्यों से आकर लोगों ने यहाँ अपना स्थान बनाया। तमिलों ने यहाँ लगभग 100-150 वर्षों तक शासन किया, तो यहाँ की संस्कृति में तमिल भी शामिल हो गये, यहाँ के खान-पान और रहन-सहन में उनका भी योगदान रहा। इस प्रकार से तमिल, सिंहली और अंग्रेजी भाषा का प्रचार-प्रसार हुआ। यहाँ के Ella (एल्ला) और Nuwara Eliya (नुवारा एलिया) क्षेत्र पर ब्रिटिश वालों का कब्जा रहा, उन्हें यह जगह इंग्लैंड जैसी लगी जो कि हरा-भरा, ठंडा और पहाड़ी क्षेत्र है। एक समय पर श्रीलंका काफी का एक बड़ा निर्यातक देश रहा। फंगस बीमारी की वजह से काफी के पेड़ नष्ट हो गये तो अंग्रेजों ने यहाँ आकर चाय के पौधे का वृक्षारोपण किया और इस प्रकार इस क्षेत्र में चाय के बागान तैयार हो गये।

आज यह विश्व की अच्छी चाय का चौथा बड़ा निर्यातक देश है। चारों तरफ समुद्र से घिरा होने के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है क्योंकि बहुत से विश्व के अच्छे बीच यहाँ पर हैं। सर्फिंग, वाटरस्पोर्ट्स, व्हेल, डॉल्फिन देखने को अच्छी जगह भी। जंगल होने के कारण विश्व के बहुत से पशु-पक्षियों की बहुत सी जातियां यहाँ पायी जाती हैं। जंगल में हाथी, भैंसे, शेर और हिरन इत्यादि प्रचुर मात्रा में हैं। समुद्र तट और पहाड़ियों से घिरा यह क्षेत्र एक विशेष प्रकार के हाथियों का निवास स्थान है, जो कि भारतीय हाथियों से भिन्न हैं।अंग्रेजों ने पहली बार कोलम्बो से कैंडी के लिए ट्रेन चलायी जो कि पहाड़ियों से होकर गुजरती है, बहुत से मनमोहक दृश्य इस रास्ते पर आते हैं, एक ब्रिज भी है जो कि स्थानीय और यूरोपियन तकनीक से बनाया गया है, यह श्रीलंका के वर्ल्ड हैरिटेज साइट में शामिल है।सिगिरिया क्षेत्र में लायन फोर्ट है जो कि एक बड़ी चट्टान पर बना है, कहते हैं कि ईसा से तीसरी सदी पूर्व 4th सेंचुरी में विक्रमबाहु से बनवाया था, इसे देखने के लिए अच्छी-खासी ट्रैकिंग करनी पड़ती है, यह समुद्र तट से लगभग 1000 to 1200 मीटर की ऊँचाई पर रहा होगा, आज भी यहाँ उद्यान और पेड़-पौधे संरक्षित हैं। फोर्ट के द्वार पर शेर के पंजे बने हुए हैं कहते हैं कि कभी यहाँ पर ऊपर शेर के सिर भी रखे हुए थे।पूरी श्रीलंका के मध्य क्षेत्र में बुद्ध के स्तूप, मूर्तियां और गुफाओं में भित्ति चित्र बने हुए हैं जो कि बुद्ध की कहानी को परिलक्षित करते हैं।

अनुराधापुर कभी यहाँ की राजधानी रहा और खूब फला-फूला, यहाँ मिन्ताले पहाड़ियों पर भिक्षु महेन्द्र की राजा देवानां प्रिय तिस्स से मुलाकात हुई, बाद में बहुत से बुद्ध मठों का निर्माण हुआ, यहाँ पर संघमित्रा द्वारा भारत से लाया बोधि-वृक्ष का रोपण हुआ। राजा महेन्द्र और संघमित्रा ने जीवन के अंतिम दिनों तक यहाँ पर प्रवास किया, 80 तथा 78 वर्ष की आयु में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। इनकी अस्थियों को लेकर मिन्ताले की पहाड़ियों पर स्तूप बनाये गये। पूरे श्रीलंकन अनुयायियों के लिए यह बहुत पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ के कैंडी शहर में बुद्ध का दन्त अवस्थित है, जिसे दन्त टेम्पल भी कहा जाता है। प्रतिदिन दिन में तीन बार यह पर्यटकों के देखने के लिए मुख्य भाग खुलता है। वर्ष में एक बार पूरे शहर में रथयात्रा और उत्सव भी मनाया जाता है।ब्लू लिली यहाँ का राष्ट्रीय फूल है और कोई राष्ट्रीय पशु यहाँ का प्रतीक नहीं है। यहाँ का राष्ट्रीय ध्वज भी बहुत कॉम्प्लीकेटेड है।आज कोलम्बो देश का सबसे बड़ा और औद्योगिक शहर है। यहाँ का बंदरगाह जो चाइना के द्वारा विकसित किया जा रहा है। बाद में जयवर्धनेपुर यहाँ की राजनीतिक राजधानी है।यहाँ से प्रत्यक्ष रूप से भारत की दूरी बहुत कम है, भारत के रामेश्वरम् के धनुषकोटी से लगभग 20-25 किमी० ही होगा। कहते हैं कि किसी समय में यहाँ भारत से सड़क मार्ग द्वारा भी जुड़ा हुआ था।आज दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु के शहर चेन्नई से कोलम्बो एक घण्टे की हवाई यात्रा के द्वारा पहुँच सकते हैं और अन्य दक्षिण भारतीय शहर बेंगलुरु, त्रिवेन्द्रम, हैदराबाद और पूना से भी हवाई सम्पर्क मार्ग आसान है। विश्व के अन्य मध्य एशियाई और दक्षिणी एशियाई देशों जैसे कतर, दुबई, ओमान, सऊदी अरब तथा थाईलैंड, म्यांमार, मलेशिया, सिंगापुर, वियतनाम एवं जापान के लिए भी फ्लाइट उपलब्ध हैं।भारत से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता भी बहुत पुराना है, खान-पान और रहन-सहन दक्षिण भारत से बहुत मिलता-जुलता है। कई आंतरिक और बाह्य परेशानियां होते हुए भी आज के समय में श्रीलंका विकास की ओर बढ़ रहा है और हिन्द महासागर के प्रमुख पर्यटन क्षेत्र के रूप में उभरा है। बुद्ध के पुरातन ज्ञान और शिक्षाओं के संरक्षण और संवर्धन में श्रीलंका ने प्रमुख भूमिका निभायी है।

More Stories
भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का पर्व है; शिवरात्रि महापर्व: स्वामी रामभजन वन
शेयर बाज़ार में पैसे कैसे कमाएँ?
मेयर थपलियाल ने संत शिरोमणि रविदास जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनको कोटि-कोटि नमन किया