October 29, 2026

परमार्थ निकेतन में पाँच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स का समापन

परमार्थ निकेतन में पाँच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स का समापन
✨वेदान्त की ज्ञानधारा, योग की साधना और आत्मबोध की यात्रा का पावन संगम
🌸पूज्य डाॅ. साध्वी भगवती सरस्वती जी से भेंट कर साधकों ने आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का पाया समाधान
🌺वेदान्त, स्वयं को जानने से सम्पूर्ण अस्तित्व को समझने तक की यात्रा

ऋषिकेश, 29 अक्टूबर। परमार्थ निकेतन में पाँच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स का समापन, आध्यात्मिक चेतना, आत्मचिंतन और जीवन के गहनतम प्रश्नों को समझने की एक अनुपम यात्रा के रूप में हुआ। यह कोर्स योग को केवल शरीर की साधना नहीं, बल्कि स्वयं को जानने, मन को समझने और जीवन के वास्तविक स्वरूप का बोध प्राप्त करने की समग्र प्रक्रिया के रूप में अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है।
इस पावन अवसर पर प्रतिभागियों को परमार्थ निकेतन की आध्यात्मिक परम्परा, गंगा तट की शान्तिमयी ऊर्जा और भारतीय ऋषि संस्कृति के सान्निध्य में वेदान्त की शिक्षाओं को समझने का अवसर प्राप्त हुआ। कोर्स के दौरान योग, ध्यान, आत्मचिंतन और वेदान्त के सिद्धान्तों के माध्यम से जीवन को अधिक सजग, संतुलित, सार्थक और शांतिमय बनाने का अभ्यास कराया।
पूज्य डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि वेदान्त हमें जीवन से दूर जाना नहीं, बल्कि जीवन को उसकी वास्तविकता में समझना सिखाता है। जब हम स्वयं को जानने की यात्रा प्रारम्भ करते हैं, तब हमारे भीतर उठने वाले प्रश्नों, विचारों और भावनाओं को समझने की दृष्टि विकसित होती है। वेदान्त का उद्देश्य केवल शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारना है, ताकि हमारे विचारों में स्पष्टता, व्यवहार में करुणा और जीवन में शांति का प्रादुर्भाव हो। जब हम अपने वास्तविक स्वरूप को समझने लगते हैं, तब जीवन को देखने का हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है।
वेदान्त भारतीय ऋषि परम्परा का वह दिव्य ज्ञान है, जो बाहरी उपलब्धियों से आगे बढ़कर अपने वास्तविक स्वरूप की खोज करने के लिए प्रेरित करता है। संसार में मनुष्य जीवनभर अनेक प्रश्नों के उत्तर खोजता है, मैं कौन हूँ? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? सुख और शान्ति कहाँ हैं? परिस्थितियाँ बदलने पर मन विचलित क्यों हो जाता है? और क्या बाहरी परिवर्तन के बिना भी आंतरिक शान्ति सम्भव है?
उपनिषदों का महावाक्य “तत्त्वमसि”, अर्थात् “वह तुम हो”, आत्मबोध की इसी महान सम्भावना की ओर संकेत करता है। यह मनुष्य को अपने भीतर निहित चेतना की गहराई को समझने के लिए आमंत्रित करता है। वेदान्त की यह दृष्टि जीवन से विमुख होने की नहीं, बल्कि जीवन को अधिक जागरूकता, करुणा, विवेक और उत्तरदायित्व के साथ जीने की प्रेरणा देती है।
पाँच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स के प्रतिभागियों ने परमार्थ निकेतन की आध्यात्मिक परम्परा में पूज्य डाॅ. साध्वी भगवती सरस्वती जी से भेंट कर विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर अपनी जिज्ञासाएँ व्यक्त कीं तथा उनके समाधान प्राप्त किए।
पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी से हुई यह भेंट प्रतिभागियों को आध्यात्मिक विषयों पर गहराई से विचार करने और वेदान्त की शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन से जोड़ने की प्रेरणा देने वाला अवसर है।
योग और वेदान्त का समन्वय भारतीय ज्ञान परम्परा की विशिष्टता है। योग हमें अनुशासन, एकाग्रता, संतुलन और साधना की दिशा में ले जाता है, जबकि वेदान्त उसे अपने अस्तित्व की गहराई को समझने की दृष्टि प्रदान करता है। दोनों का उद्देश्य जीवन में जागरूकता का विस्तार और आंतरिक परिपक्वता का विकास है।
योग शरीर को साधने की प्रेरणा देता है, ध्यान मन को देखने की क्षमता विकसित करता है और वेदान्त स्वयं को समझने की दृष्टि प्रदान करता है। जब ये तीनों जीवन में समन्वित होते हैं, तब साधना केवल अभ्यास नहीं रहती, बल्कि जीवन जीने की एक सजग पद्धति बन जाती है।
परमार्थ निकेतन में आरम्भ हुआ पाँच दिवसीय वेदान्त योग कोर्स इसी आत्मचिंतनशील यात्रा का अवसर है। परमार्थ निकेतन में वेदान्त और योग का यह पावन संगम ज्ञान को जीवन, साधना को अनुभव और आध्यात्मिकता को मानवता की सेवा से जोड़ने का एक प्रेरणादायी प्रयास है।