April 21, 2026

तृतीय दीक्षांत समारोह, आई आई एमटी विश्वविद्यालय परिसर गंगानगर, मेरठ

*तृतीय दीक्षांत समारोह, आई आई एमटी विश्वविद्यालय परिसर गंगानगर, मेरठ*

*भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी पी राधाकृष्णन जी की गरिमामयी उपस्थिति*

*परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य*

*भारतीय संस्कृति के ज्योतिर्धर, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी की पावन जयंती पर कोटिशः नमन*

*माननीय सांसद, राज्यसभा, श्री लक्ष्मीकान्त बाजपेयी जी, निदेशक, महर्षि पराशर, ज्योतिष विद्यालय, श्री हरिसिंह रावत जी, माननीय कुलाधिपति, आई आई एम टी, विश्वविद्यालय, मेरठ, श्री योगेश मोहन गुप्ता जी, माननीय प्रति कुलााधिपति, आई आई एम टी, विश्वविद्यालय, मेरठ, डा मयंक अग्रवाल जी, माननीय कुलपति, आई आई एम टी, विश्वविद्यालय, मेरठ, प्रो दीपा शर्मा जी, कुलसचिव, आई आई एम टी, विश्वविद्यालय, मेरठ डा वीपी राकेश जी और अनेक विशिष्ट विभूतियों की गरिमामयी उपस्थिति*

मेरठ, 21 अप्रैल। आई आई एमटी विश्वविद्यालय, गंगानगर, मेरठ के तृतीय दीक्षांत समारोह का आयोजन अत्यंत भव्य, गरिमामय एवं प्रेरणादायी वातावरण में आयोजित किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन जी की गरिमामयी उपस्थिति रही।

समारोह में अध्यक्ष, परमार्थ निकेतन, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊँचाइयों से अनुप्राणित किया। पूज्य ने विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को जीवन मूल्यों, राष्ट्रसेवा और संस्कारयुक्त शिक्षा का संदेश दिया।

माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन जी ने कहा कि शिक्षा, राष्ट्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवता की सेवा का आधार है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे अपने ज्ञान, कौशल और प्रतिभा का उपयोग भारत को विकसित, समृद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने में करें। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं नवाचार को बढ़ावा देने हेतु शुभकामनाएँ भी दीं।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल शैक्षणिक यात्रा का समापन नहीं, बल्कि सेवा, संस्कार और समर्पण से युक्त जीवन के नये अध्याय का शुभारंभ है। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में अपनी प्रोफाइल बनाइए, उसे अपडेट कीजिये, परंतु ध्यान रहे स्वयं की फाइल को कभी न भूले।

आज जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी की पावन जयंती पर उन्हें नमन करते हुये कहा कि यह दीक्षांत समारोह केवल उपाधि लेने का क्षण नहीं, बल्कि चेतना, चरित्र और कर्तव्य के जागरण का महापर्व है। आदि शंकराचार्य ने अल्पायु में समस्त भारत को ज्ञान, अध्यात्म और एकता के सूत्र में पिरो दिया। उन्होंने बताया कि जब संकल्प प्रखर हो, तो आयु नहीं, दृष्टि इतिहास रचती है।

आप सब उसी भारत की युवा शक्ति हैं। आपके हाथों में डिग्री है, पर उससे भी अधिक आपके भीतर अनंत संभावनाओं का दीप है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना ही नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानना, समाज को दिशा देना और राष्ट्र को ऊँचाइयों तक ले जाना है। आधुनिक विज्ञान अपनाइए, नई तकनीक सीखिए, पर अपनी जड़ों, संस्कारों और संस्कृति से कभी मत कटिए।

याद रखिए, जो भी अपने मूल्यों से जुड़ा रहा चाहे स्वामी विवेकानन्द जी हो या गांधी जी उन्होंने अपने मूल से जुड़कर विश्व का नेतृत्व किया। जो स्वयं को जीत लेता है, वही संसार जीतता है। स्वामी जी ने कहा कि सफलता वही है जिसमें समृद्धि के साथ संवेदना हो, उपलब्धि के साथ विनम्रता हो और प्रगति के साथ राष्ट्रभाव हो।

अपने जीवन को केवल करियर ओरिएंटेड मत बनाओ, उसे एक मिशन बनाओ। अपने भीतर के शंकराचार्य को जगाओ, ज्ञान में तेजस्वी, विचार में निर्भीक, कर्म में श्रेष्ठ और राष्ट्र के प्रति समर्पित भावना जाग्रत करे, यही वास्तविक दीक्षांत, यही भारत का भविष्य है।

दीक्षांत समारोह के दौरान विभिन्न संकायों के स्नातक, स्नातकोत्तर एवं शोध विद्यार्थियों को उपाधियाँ प्रदान की गईं। मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक एवं विशेष सम्मान देकर प्रोत्साहित किया गया।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि संस्थान का उद्देश्य आधुनिक शिक्षा के साथ नैतिकता, नेतृत्व और सामाजिक चेतना से युक्त नागरिक तैयार करना है।

यह तृतीय दीक्षांत समारोह शिक्षा, संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्र निर्माण के अद्भुत समन्वय का प्रेरणास्पद उदाहरण बनकर उपस्थित जनमानस के हृदय में अमिट छाप छोड़ी।