August 4, 2026

श्रावण के प्रथम सोमवार के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में आयोजित दिव्य रुद्राभिषेक

श्रावण के प्रथम सोमवार के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में आयोजित दिव्य रुद्राभिषेक
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं ऋषिकुमारों ने किया भगवान शिव का रुद्राभिषेक और की विश्वशांति, प्रकृति संरक्षण एवं मानव कल्याण की कामना
शिवाभिषेक के साथ धराभिषेक का दिया संदेश
श्रावण, मौन से महादेव तक और स्वयं से शिव तक की यात्रा
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 3 अगस्त। श्रावण मास का प्रथम सोमवार परमार्थ निकेतन में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति, वैदिक मंत्रोच्चार एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया। इस पावन अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने वैदिक परम्परा के अनुसार भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया। प्रातःकाल विश्व शान्ति यज्ञ, वैदिक ऋचाओं का पाठ, श्रीरुद्रम तथा महामृत्युंजय मंत्रों से सम्पूर्ण वातावरण शिवमय हो गया। भगवान शिव का अभिषेक गंगाजल, दुग्ध, दधि, घृत, मधु, शर्करा, बिल्वपत्र एवं विविध सुगंधित पुष्पों से कर विश्वशांति, पर्यावरण संरक्षण, मानवता के कल्याण तथा समस्त प्राणियों के मंगल की प्रार्थना की।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि जितने भी कांवड़ियाँ भगवान शिव को जल अर्पित करने के लिए आ रहे हैं, वे सभी यह ध्यान रखें कि यात्रा श्रद्धा, शांति और अनुशासन के साथ सम्पन्न हो। किसी भी प्रकार का हंगामा, हुड़दंग या हिंसा न हो। शिवोऽहम्, शिवोऽहम् का जप करते हुए आगे बढ़ें। शोर नहीं, शांति का संदेश दें; आक्रोश नहीं, आस्था का परिचय दें।

भारत की यह भोली-भाली जनता, जो भोले बाबा के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण के साथ भोले बनकर कांवड़ यात्रा करते हैं, उनकी आस्था और उनकी श्रद्धा को मेरा विनम्र प्रणाम। यही श्रद्धा और विश्वास हमारी सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है, जिसने इस राष्ट्र की आध्यात्मिक परंपरा को सनातन काल से सुरक्षित, जीवंत और अक्षुण्ण बनाए रखा है। यही आस्था और श्रद्धा आज भी समाज के लिए संजीवनी का कार्य करती है तथा हमें प्रेम, सेवा, सद्भाव और शिवत्व के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

उन्होंने कहा कि श्रावण आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और आत्मजागरण का दिव्य पर्व है। यह बाहरी पूजा से अधिक अपने भीतर स्थित शिवतत्त्व को जागृत करने का अवसर है। जब मन मौन होता है, तभी जीवन में महादेव का अवतरण होता है। श्रावण, मौन से महादेव तक और स्वयं से शिव तक की यात्रा है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भगवान शिव हमें त्याग, करुणा, धैर्य, संतुलन और समरसता का संदेश देते हैं। शिव अपने मस्तक पर चन्द्रमा धारण करते हैं, जटाओं में माँ गंगा हैं, कण्ठ में विष धारण कर सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा करते हैं और प्रत्येक जीव को समान दृष्टि से स्वीकार करते हैं। स्वयं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण का भाव ही शिवत्व है।

उन्होंने कहा कि आज मानवता अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रही है, पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव, हिंसा, असहिष्णुता और प्रकृति से बढ़ती दूरी, इन सभी समस्याओं का समाधान भगवान शिव के जीवन-दर्शन में निहित है। यदि हम अपने भीतर करुणा, संयम, सहिष्णुता और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को विकसित करें तो परिवार, समाज और विश्व में स्थायी शांति स्थापित हो सकती है।

पूज्य स्वामी जी ने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि श्रावण का वास्तविक व्रत अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली को पवित्र बनाना है। अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता का त्याग कर प्रेम, सेवा, संवेदना और सद्भाव को अपनाना ही भगवान शिव की आराधना है।

उन्होंने कहा, भगवान शिव प्रकृति के आदि योगी हैं। उनकी पूजा तभी पूर्ण होगी जब हम नदियों को स्वच्छ रखें, वृक्षों का संरक्षण करें, जल का सम्मान करें और धरती माता की सेवा करें। यदि धरती हरी-भरी होगी, नदियाँ निर्मल होंगी और पर्यावरण संतुलित रहेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और समृद्ध भविष्य प्राप्त होगा।

समापन में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि श्रावण मास को सेवा, साधना और संस्कार का महापर्व बनाएं। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन कुछ समय ध्यान, जप, मौन, योग, प्रार्थना एवं निःस्वार्थ सेवा के लिए अवश्य निकालें तथा आत्मचिंतन के लिए मोबाइल फास्टिंग का भी संकल्प लें। उन्होंने कहा कि यदि हम कुछ समय मोबाइल से दूरी बनाकर स्वयं से जुड़ें, तो जीवन में शांति, संतुलन और शिवत्व का वास्तविक अनुभव संभव है। अंत में उन्होंने सभी के लिए भगवान शिव से सुख, शांति, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि एवं समस्त विश्व के कल्याण की मंगलकामना करते हुए श्रावण मास को आत्मपरिवर्तन और लोकमंगल का पावन पर्व बनाने का संदेश दिया।