वेदों की ओर लौटो*
महर्षि दयानंद सरस्वती जी की जयंती पर श्रद्धा-सुमन*
विकिपीडिया की तर्ज पर एक ‘वैदिकपीडिया’ का निर्माण हो, जहाँ से भावी पीढ़ी को प्रामाणिक ज्ञान के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा प्राप्त हो सके*
स्वामी चिदानन्द सरस्वती*
ऋषिकेश, 12 फरवरी। आर्य समाज के प्रवर्तक, महान समाज सुधारक, अद्वितीय चिंतक और भारतीय नवजागरण के अग्रदूत महर्षि दयानंद सरस्वती जी की पावन जयंती के अवसर पर परमार्थ निकेतन की ओर से उनकी तपःपूत स्मृति को कोटि-कोटि नमन।
आज का दिन भारत की आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक जागरण और वैदिक पुनरुत्थान के संकल्प का अवसर है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र, धर्म और समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर किया। उनका उद्घोष “वेदों की ओर लौटो” आज भी भारत की आत्मा को जागृत करने वाला मंत्र है।
महर्षि दयानंद जी ने उस समय जन्म लिया जब भारतीय समाज को वास्तव में एक ऐसे प्रकाश की आवश्यकता थी जो उन्हें वेदों से जोड़ सके। तब उन्होंने संन्यास धारण कर सत्य की खोज की और वेदों के प्रकाश से समाज को नई दिशा देने का संकल्प लिया। उनका स्पष्ट संदेश था कि सत्य ज्ञान का स्रोत वेद हैं, और इन्हीं के आधार पर श्रेष्ठ जीवन का निर्माण हो सकता है।
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने अंधश्रद्धा, बाल विवाह, सती प्रथा, छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरुद्ध निर्भीक होकर आवाज उठाई। उन्होंने समाज को तर्क, विज्ञान और विवेक के साथ धर्म को समझने की प्रेरणा दी। उनका मानना था कि धर्म वह है जो मानवता का कल्याण करे, जो समाज को जोड़ने का कार्य करे, न कि विभाजन का। इसी सोच के साथ उन्होंने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की, जो सामाजिक और आध्यात्मिक क्रांति का आधार बना।
शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। उन्होंने स्त्री-शिक्षा, वैदिक शिक्षा और आधुनिक ज्ञान के समन्वय पर बल दिया। उनका विश्वास था कि शिक्षित समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से चरित्रवान, संस्कारित और राष्ट्रभक्त नागरिक तैयार करने का उनका स्वप्न आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने नारियों को समान अधिकार देने, उन्हें शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने का जो अभियान चलाया, वह उस समय के लिए एक क्रांतिकारी कदम था।
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने जाति-प्रथा और सामाजिक भेदभाव का तीव्र विरोध किया। उनका विचार था कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म और गुणों से होनी चाहिए, जन्म से नहीं। उन्होंने वर्गविहीन, जातिविहीन और समतामूलक समाज की परिकल्पना प्रस्तुत की। उनके विचारों ने भारतीय समाज को आत्मगौरव, स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत किया। उनके द्वारा लिखित ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ने लाखों लोगों के जीवन को दिशा दी और उन्हें सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती जी एक राष्ट्रनिर्माता थे। उनके विचारों ने स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक सेनानियों को प्रेरित किया। स्वदेशी भावना, आत्मनिर्भरता और भारतीय संस्कृति के प्रति गर्व का जो बीज उन्होंने बोया, वही आगे चलकर राष्ट्रवाद की सशक्त धारा बना।
आज जब आधुनिकता की दौड़ में हमारे युवा अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय “वेदों की ओर लौटो” अर्थात् प्राचीनता की ओर जाना नहीं, बल्कि सत्य, ज्ञान, नैतिकता और मानवता के मूल्यों को पुनः अपनाना है। यह संदेश हमें अपनी संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक धरोहर पर गर्व करने की प्रेरणा देता है।
आज समय की आवश्यकता है कि विकिपीडिया की तर्ज पर एक ‘वैदिकपीडिया’ का निर्माण हो, जहाँ से भावी पीढ़ी को प्रामाणिक ज्ञान के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा प्राप्त हो सके।

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