September 16, 2026

अमेरिका से लंदन और लंदन से ऋषिकेश लौटे पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी

अमेरिका से लंदन और लंदन से ऋषिकेश लौटे पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी*

*पहली बार टेम्स के तट माँ गंगा की आरती, लंदन में आध्यात्मिक समागम, टीविन टावर्स ’11 सितंबर 2001 – मानवता की स्मृति में एक मौन श्रद्धांजलि, डिवाइन कनेक्शन इन ए डिजिटल एज’ और भारतीय संस्कृति का विश्व ग्लोब में प्रसारित कर आज भारत लौटे पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी*

*परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों, आचार्यों एवं परमार्थ परिवार ने पुष्पवर्षा और शंखनाद से किया अभिनन्दन*

ऋषिकेश, 16 सितम्बर। अमेरिका से लंदन और वहाँ से आज देवभूमि उत्तराखंड, ऋषिकेश लौटे परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों, आचार्यों एवं समस्त परमार्थ परिवार ने अत्यंत भावपूर्ण अभिनन्दन किया। पूज्य गुरुदेव के आश्रम आगमन पर पुष्पवर्षा, शंखनाद और जयघोष से पूरा परमार्थ परिसर गूँज उठा। लम्बी विदेश यात्रा के पश्चात अपने गुरुदेव का सान्निध्य पाकर परमार्थ परिवार भाव-विभोर हो उठा।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी की यह यात्रा, एक आध्यात्मिक यात्रा थी। भारत की सनातन चेतना, संस्कृति, करुणा, पर्यावरण-संरक्षण और विश्वबंधुत्व के संदेश को विश्व ग्लोब पर पहुंचाने का एक उत्कृष्ट प्रयास है। अमेरिका से लंदन तक अनेक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने भारतीय ऋषि परम्परा के उस अमर संदेश को विश्व समुदाय तक पहुँचाया कि समस्त मानवता एक परिवार है और प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी जीवनदायिनी माता है।

लंदन में 13 सितम्बर को ऐतिहासिक टेम्स नदी के तट पहली बार गंगा आरती के दिव्य आयोजन में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य ने भारतीय आध्यात्मिक परम्परा को एक नया वैश्विक आयाम प्रदान किया। ग्रीनविच स्थित ऐतिहासिक ओल्ड रॉयल नेवल कॉलेज में आयोजित इस ‘गंगा आरती ऑन, थेम्स, ए सेरेमनी ऑफ लाइट’ में हजारों लोग सहभागी बने।

माँ गंगा के तट ऋषिकेश से लेकर टेम्स के तट लंदन तक पहुँची आरती की ज्योति ने यह संदेश दिया कि नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि सभ्यताओं, संस्कृतियों, स्मृतियों और चेतना की धाराएँ हैं। भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परम्परा जब विश्व के विभिन्न भूभागों तक पहुँचती है तो वह किसी संस्कृति को प्रतिस्थापित नहीं करती, बल्कि प्रेम, सम्मान और एकत्व का प्रकाश फैलाती है।

लंदन प्रवास के दौरान पूज्य स्वामी जी ने आध्यात्मिकता और आधुनिक जीवन, भारतीय ज्ञान परम्परा और डिजिटल युग, तथा सनातन मूल्यों और वैश्विक मानवता के मध्य एक सेतु स्थापित करने का संदेश भी दिया। ’डिवाइन कनेक्शन इन ए डिजिटल एज’ जैसे आध्यात्मिक संवादों के माध्यम से उन्होंने यह आह्वान किया कि तकनीक हमारे जीवन को जोड़ने का माध्यम बने, परन्तु मनुष्य अपने भीतर के दिव्य स्रोत से न टूटे। आधुनिकता की गति के साथ यदि आत्मचेतना, करुणा और संस्कारों की गहराई जुड़ जाए तो तकनीक भी मानवता की सेवा का माध्यम बन सकती है।

इसी यात्रा के दौरान 11 सितम्बर 2001 को घटित ट्विन टावर्स त्रासदी की स्मृति में मानवता के प्रति एक मौन श्रद्धांजलि भी अर्पित की। उस पीड़ा की स्मृति में नमन करते हुए पूज्य स्वामी जी ने प्रेम, शान्ति, करुणा और एकता के उस संदेश को पुनः स्मरण कराया जिसकी आज सम्पूर्ण विश्व को आवश्यकता है। किसी भी त्रासदी की स्मृति हमें विभाजन की ओर नहीं, बल्कि मानवता को और अधिक जोड़ने की प्रेरणा दे, यही भारतीय ऋषि परम्परा का संदेश है।

आज जब पूज्य गुरुदेव ऋषिकेश स्थित अपने आध्यात्मिक गृह, परमार्थ निकेतन लौटे तो ऐसा लगा मानो विदेश यात्रा के पश्चात विश्वभर में प्रज्वलित भारतीय अध्यात्म की ज्योति पुनः माँ गंगा के पावन तट पर आकर प्रतिष्ठित हो गई हो।

पूज्य स्वामी जी के आगमन पर परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने शंखनाद करते हुए उनका अभिनन्दन किया। आचार्यों एवं परमार्थ परिवार के सदस्यों ने पुष्पवर्षा कर अपने गुरुदेव का अभिनन्दन किया। सभी की आँखों में प्रसन्नता, हृदय में श्रद्धा और मन में अपने गुरुदेव के पुनः सान्निध्य का अपार आनंद था।

परमार्थ परिवार के लिए पूज्य गुरुदेव का लौटना प्रेरणा, ऊर्जा, स्नेह और आध्यात्मिक प्रकाश का पुनः अपने बीच लौटना है।