November 4, 2026

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली में ‘वैशेषिककोशः’ ग्रन्थ का लोकार्पण

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली में ‘वैशेषिककोशः’ ग्रन्थ का लोकार्पण
✨प्रो. शशिप्रभा कुमार जी का अभिनन्दन समारोह
🌺महर्षि कणाद की ज्ञान परम्परा ने हजारों वर्ष पूर्व पदार्थ, परमाणु और सृष्टि के सूक्ष्म स्वरूप पर किया गहन चिंतन
💥भारतीय शास्त्रों में विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय; प्राचीन ज्ञान परम्परा को आधुनिक शोध और वैश्विक विमर्श से जोड़ने का आह्वान
🌺वैशेषिक दर्शन भारत की प्राचीन वैज्ञानिक चेतना और ऋषियों की अद्भुत तत्त्व, दृष्टि का प्रतीक
स्वामी चिदानन्द सरस्वती

नई दिल्ली, 4 नवम्बर 2026। भारतीय ज्ञान परम्परा में आध्यात्मिक अनुभूतियों और जीवन-दर्शन का सार समाहित है, इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, प्रकृति की संरचना, पदार्थ के स्वरूप, परमाणु, चेतना और अस्तित्व के मूलभूत प्रश्नों पर भी अत्यंत गहन, तार्किक एवं विश्लेषणात्मक चिंतन समाहित है। भारत की ऋषि परम्परा ने हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के सूक्ष्मतम रहस्यों को जानने और समझने की जो जिज्ञासा विकसित की, वह आज भी मानवता के लिए प्रेरणास्रोत है। वैशेषिक दर्शन इसी अद्भुत वैज्ञानिक चेतना, तत्त्वचिंतन और ज्ञान-साधना का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इन्हीं गौरवशाली भारतीय ज्ञान परम्पराओं के संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक प्रतिष्ठा की दिशा में 4 नवम्बर 2026 को केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली में ‘वैशेषिककोशः’ ग्रन्थ का लोकार्पण एवं प्रख्यात विदुषी प्रो. शशिप्रभा कुमार जी का अभिनन्दन समारोह का आयोजन किया गया।
इस गरिमामय समारोह में परमार्थ पीठाधीश्वर, परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। पूज्य स्वामी जी के पावन सान्निध्य, आध्यात्मिक गरिमा और प्रेरणादायी उद्बोधन से समारोह में उपस्थित विद्वतजनों, आचार्यों एवं विद्यार्थियों ने स्वयं को अभिभूत एवं धन्य अनुभव किया।

इस अवसर पर प्रो डा शशिप्रभा कुमार जी, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, प्रो रमेश कुमार पाण्डेय जी, अखिल भारतीय अध्यक्ष, संस्कृत भारती, प्रो श्रीनिवास वरखेडी जी, कुलपति केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, कई विश्वविद्यालयों के कुलपति, प्रोफेसर, विद्वान विभूतियां और अनेक विशिष्ट विभूतियों की गरिमामयी उपस्थति रही।

वैशेषिककोशः’ ग्रन्थ के लोकार्पण, भारतीय शास्त्रीय ज्ञान के व्यवस्थित संकलन, संरक्षण और प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। शास्त्रों की पारिभाषिक शब्दावली और दार्शनिक अवधारणाओं को समझने के लिए ऐसे ग्रंथ अत्यंत उपयोगी हैं। ज्ञान तभी जीवंत रहता है, जब वह पुस्तकों और पुस्तकालयों तक सीमित न रहकर विद्यार्थियों, शोधार्थियों और समाज की चेतना का हिस्सा बनता है।
प्रो. शशिप्रभा कुमार जी का अभिनन्दन करते हुये पूज्य स्वामी जी ने कहा कि वे महान विदुषी हैं और ऐसी विभूतियों का सम्मान ज्ञान-साधना, विद्वत्ता, अनुसंधान और भारतीय शास्त्रीय परम्परा के प्रति समर्पण का सम्मान है। ऐसे विद्वानों की वर्षों की साधना और अकादमिक योगदान हमारी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत को नई पीढ़ियों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ज्ञान की परम्परा तभी निरंतर प्रवाहित रहती है, जब उसे समर्पित साधक अपने जीवन का ध्येय बना लेते हैं।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने भारतीय दर्शन, महर्षि कणाद की वैज्ञानिक दृष्टि, संस्कृत वाङ्मय की समृद्धि तथा सनातन ज्ञान की वैश्विक प्रासंगिकता पर विशेष उद्बोधन दिया।
उन्होंने कहा कि भारत ने केवल सभ्यता का निर्माण नहीं किया, बल्कि सृष्टि को समझने की दृष्टि भी विश्व को प्रदान की है। हमारी ऋषि परम्परा की विशेषता रही है कि उसने बाहरी जगत के रहस्यों को जानने के साथ ही हमारेे भीतर के सत्य की खोज भी की। महर्षि कणाद का वैशेषिक दर्शन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय मनीषा में पदार्थ, प्रकृति और सृष्टि के मूलभूत तत्त्वों को लेकर कितना सूक्ष्म, व्यवस्थित और तार्किक चिंतन विकसित हुआ था।

उन्होंने कहा कि महर्षि कणाद ने पदार्थ के सूक्ष्मतम स्वरूप को समझने के लिए परमाणु की अवधारणा सहित द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय जैसे सिद्धांतों का गहन विवेचन किया। वैशेषिक दर्शन हमें बताता है कि भारतीय ऋषि केवल श्रद्धा और अनुभूति के साधक ही नहीं थे, वे तर्क, प्रमाण, विश्लेषण और अनुसंधान के भी महान उपासक थे। उनकी दृष्टि में ज्ञान का अर्थ केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि वस्तु के वास्तविक स्वरूप का बोध प्राप्त करना था।

पूज्य स्वामी जी ने विज्ञान और अध्यात्म के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विज्ञान सृष्टि के स्वरूप, उसकी प्रक्रियाओं और कार्यप्रणाली को समझने का प्रयास करता है, जबकि अध्यात्म अस्तित्व के मूल आधार, चेतना और जीवन के परम उद्देश्य की ओर ले जाता है। दोनों की जिज्ञासाएँ भिन्न आयामों से आरंभ हो सकती हैं, लेकिन सत्य की खोज दोनों का मूल भाव है। भारतीय दर्शन की विशेषता यही है कि यहाँ ज्ञान के विभिन्न आयामों को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि व्यापक सत्य की ओर अग्रसर होने वाले मार्गों के रूप में देखा गया है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि संस्कृत, भारत की ज्ञान-संपदा की संवाहिका है। वेद, उपनिषद, दर्शन, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, व्याकरण और साहित्य सहित ज्ञान की असंख्य धाराएँ संस्कृत वाङ्मय में सुरक्षित हैं। संस्कृत के प्रत्येक शब्द, प्रत्येक सूत्र और प्रत्येक शास्त्रीय अवधारणा के पीछे गहन चिंतन एवं विशिष्ट ज्ञान-दृष्टि निहित है। इस अमूल्य विरासत का संरक्षण करने के साथ-साथ उसका आधुनिक भाषाओं में अनुवाद, व्याख्या, अनुसंधान और वैश्विक स्तर पर प्रसार भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि जिस भारत की ऋषि परम्परा ने परमाणु से लेकर परमात्मा तक चिंतन किया, उस भारत की ज्ञान-ज्योति को पुनः विश्व के समक्ष प्रतिष्ठित करना हम सभी का सामूहिक दायित्व है। हमारी ज्ञान परम्परा किसी एक काल, एक विषय अथवा एक दर्शन तक सीमित नहीं है, यह अनंत जिज्ञासाओं और अनंत संभावनाओं की धारा है।

समारोह ने भारतीय दर्शन, संस्कृत वाङ्मय और प्राचीन वैज्ञानिक चिंतन की समृद्ध विरासत को नए सिरे से समझने तथा उसे समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। ‘वैशेषिककोशः’ का लोकार्पण इसी ज्ञान-यात्रा को आगे बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।