पहाड़ों से अत्यधिक प्रवास होने के कारण हर कोई शहरीकरण की तरफ खींचा

प्रभुपाल सिंह रावत

पहाड़ों में एक चिंता का विषय आजकल सोशलमीडिया में तैर रहा है। जिस किसी को चलते रास्ते बातों-बातों में पूछ लीजिये कहाँ जा रहे हो क्या काम हैं ? जवाब आएगा या तो गाय खरीद रहे हैं या लड़की देखने जा रहे हैं। कोरोना काल में भी गौड़ी लौड़ी व्यापारी घर नही बैठे। गौड़ी (गाय) लौड़ी (लड़की) इनकी खोज में लोग लम्बी यात्राएं कर रहे हैं। गौड़ी वालों को तो कुछ जोड़ी जूते चप्पल तोड़ने के बाद सफ़लता मिल जाती हैं। किंतु लौड़ी वाले खाली हाथ हैं। यदि लड़का सरकारी नौकरी वाला हैं तो सोशलमीडिया के माध्यम से उस की पूर्व बुकिंग हो जाती हैं पर यदि लड़का प्राइवेट नौकरी या घरर्या हैं तो फिर लड़का 35, 37 वर्ष तक शादी का इंतजार करेगा। यह विकट समस्या विगत 5 से 7 वर्ष के मध्य आई हैं जिसके अनेकों कारण हैं। सामाजिक नजरिया यदि देखा जाये तो निम्नलिखित हैं। पहाड़ों में बढ़ते शराबखोरी के चलते हर दूसरे अविवाहित लड़का शराबी हैं। जिस के कारण कोई भी मातापिता किसी बच्चे पर यकीन नही कर सकता कि यह लड़की को ठीक से रखेगा। अनेकों अविवाहित लड़के गाँव में बदनाम हैं इस वजह से उन की शादी रुकी हुई हैं।

गांवो में भूमि से कमाई अब खत्म हो चुकी हैं।स्वरोजगार को बढ़ावा नही मिला, स्वरोजगार के प्रति लोगों की मानसिकता निम्नस्तरीय हैं। शहरों की चकाचौंध महिलाओं को आकर्षित कर रही हैं। मेहनत कोई नही करना चाहता हैं। कोरोना काल में होटल वालों के हाल देख अब कोई भी होटल की नौकरी वालों को लड़की देने से डर रहा हैं। बेरोजगारी की एक लंबी अवधि सब ने देख ली हैं। 2 वर्ष से बच्चे घर में ही हैं नौकरी तो भूल ही गए। अब खाने के लाले पड़ गए। फैक्ट्री जीवन भी बहुत कष्टमयी गुजर रहा हैं। स्नातक व स्नातकोत्तर विद्यालय खुलने से लड़कियों ने शिक्षा का स्तर ऊंचा किया हैं। भले ज्ञान कितना हैं यह भविष्य में देखने की बात हैं।

पढाई का स्तर उठने के बाद उम्मीदें बेहतर की ओर बढ़ रही हैं और बेहतर नौकरी वाले लड़के कम हैं। यदि लड़का सरकारी नौकरी वाला हैं तो सारे एब पर्दे के पीछे ढक जाते हैं। स्नातक के बाद तो पंख आसमान उड़ रहे हैं। जिन घरों में शादी की उम्र काट चुके बरोजगार लड़के अविवाहित हैं उन घरों में भी लड़कियां शादी की उम्र पार कर चुके अविवाहित हैं। पहाड़ों से अत्यधिक प्रवास होने के कारण हर कोई शहरीकरण की तरफ खींचा जा रहा हैं। इसलिए गाँव में रोजगार खत्म हो गए हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वरोजगार कर रहा हैं तो बाजार उपलब्ध नही हैं जिस कारण काम अधिक दिन नही चल रहा हैं। अभिभावकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई हैं। जब पैसा नही दिख रहा तो आसान नही शादी हो जाए। उपनल व संविदाधा में कर्मचारियों की नौकरी भी सुनिश्चित नही हैं।

वो दिन अब लद गए जब कहते थे शहरों को चले जाना कुछ भी करो पर जब तक शादी नही होती आप शहर रहो। इंटरनेट ने सब कबाड़ा कर दिया लड़के की नौकरी कंपनी सब इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। झूठ भी नही बोल सकते। किंतु वर्तमान स्थिति भयानक हो चुकी हैं। जिस तरह बद्री गाय का अस्तित्व खत्म होने पर आया हैं उसी तरह बद्री पुत्रों की प्रजाति लुप्त होने पर आई हैं। अविवाहित ताऊ बन चुके लौंडे अपने से छोटे भाइयों की शदियों में नाच नाच कर थक चुके हैं। सरकारी नौकरी की लालसा लिए लोग लड़का तलाश रहे हैं किंतु सरकारी नौकरी सब को नसीब नही होती। विगत कोरोना काल से गाय की तलाश में व्यापारी गाँव-गाँव घूम रहे हैं। जिन लोगों ने 3 वर्ष पूर्व गाय को जंगलों में बांध दिया था वही आज गाय खोज रहे हैं। दहेज की दस्तक गाँव को डरा रही थी कुछ वर्षों में दहेज की घटनाएं हर गांव में आने लगी थी जिस कारण कुछ दुल्हनों की जान गई तो कुछ बारात वापस लौटी किंतु आज स्थिति यह बन गई कि लड़के वाले दुल्हन वालों को राशन का खर्च देने को तैयार हैं। अब दुल्हन पक्ष को दूल्हा पक्ष दहेज दे रहा हैं। पहले लोग गाय फ्री में देते थे जो गाय दूध देना बंद करती थी लोग पैसा देकर उसे किसी के खूंटे बांध देते थे। आज स्थिति पलट गई हैं कुदरत सब कुछ ठीक ठाक कर रही हैं। समय घूम कर अपने ही पास आ रहा हैं। न गौड़ी को दुर्लभ होने देगा न लौड़ी को दहेज में जलने देगा। समय का चक्र घूम चुका हैं सिर्फ अंजाम तक पहुंचना बाकी हैं।

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